अबु हनीफा रहमतुल्लाह अलैह का 40 साल तक इशा के वुज़ू से फज़र की नमाज़ पढ़ने का क़िस्सा- शेयर करें

शेयर करें
  • 8.6K
    Shares

इमामे आज़म अबु हनीफा रहमतुल्लाह अलैह ने चालीस साल तक इशा के वुज़ू से फज़र की नमाज़ पढ़ी ओर वोह रात भर क़ुरआन पढ़ा करते थे. अबू हनीफा इराक के शहर कूफ़ा में पैदा हुए थे। वे उमय्यद खलीफा अब्द अल मलिक इब्न मरवान के समकालीन थे।उनके पिता, थबित बिन ज़ूता एक व्यापारी थे, जो मूल रूप से काबुल, अफगानिस्तान से थे.

ये बुज़ुर्ग रात भर बगैर किसी थकान वा परेशानी के क़ुरआन कैसे पढ़ लिया करते थे. लेकिन मैने जब उन लोगो को देखा जो रात भर मोबाइल मे लगे रहते है. तो मेरा ताज्जुब दूर हो गया ओर मै जान गयी के जब दिल किसी चीज़ से मुहब्बत कर बैठता है तो हर चीज़ आसान हो जाती है.

नोमान इब्न साइत इब्न ज़ौता इब्न मरज़ुबान जो अबू हनीफ़ा (हनीफ़ा के पिता) के नाम से मशहूर हैं और इन्हें इसी नाम से भी जाना जाता है. अबू हनीफ़ा सुन्नी “हनफ़ी मसलक” (हनफ़ी स्कूल) इसलामी न्यायशास्त्र के संस्थापक थे. यह एक प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान थे. ज़ैदी शिया मुसलमानों में इन्हें प्रसिद्ध विद्वान के रूप में माना जाता है. उन्हें अक्सर “महान इमाम” (ألإمام الأعظم, अल इमाम अल आज़म) कहा और माना जाता है.

खलीफ़ा अल-मनसूर 763 ई. में मुस्लिम दुनिया के खलीफ़ा थे। इन की राजधानी इराक़ का शहर बागदाद था। मुख्य न्यायाधीश स्वर्गवासी होने के कारण वह पद खाली हुआ, उसे भरती करने के लिये, खलीफ़ा ने अबू हनीफ़ा को इस पद के लिये पेशकश की, लेकिन अबू हनीफ़ा स्वतंत्र रहना पसंद करते थे, इस लिये इस प्रस्ताव और पेशकश को ठुकरा दिया। इस पद को अरबी भाषा में “क़ाझी-उल-क़ुज़्ज़ात” कहते हैं। इस पद पर उनके छात्र अबू यूसुफ नियुक्त किये गये.

खलीफ़ा अल-मनसूर और दीगर लोगों को यह बात अच्छी नहीं लगी कि, अबू हनीफ़ा ने इस पद को इनकार किया। चूं कि, अबू हनीफा इस क़ाबिल थे, और उनहें क़ाबिल समझा गया, इसी लिये उन्हें पेशकश की गयी, जिस को अबू हनीफ़ा ने खुद को क़ाबिल न बताते हुवे ठुकरा दिया। इस बात पर खलीफ़ा ने कहा कि तुम झूठ बोल रहे हो.

तब अबू हनीफ़ा ने कहा कि अगर वह झूठ बोल रहे हैं तो ऐसे झूठे को ऐसे ऊंचे पद की पेश कश नहीं करना चाहिये. इस बात पर नाराज़ खलीफ़ा ने अबू हनीफ़ा को गिरफ़्तार कर जैल में बंद करवा दिया। कुछ महीनों बाद अबू हनीफ़ा जेल ही में मर गये.

शाह इस्माइल की सफ़वी साम्राज्य 1508 ई. में अबू हनीफा और अब्दुल कादिर गिलानी की क़बरों को सरकार द्वारा नष्ट कर दिया गया. 1533 में, तुर्क साम्राज्य ने इराक और अबू हनीफा और अन्य सुन्नी स्थलों के मक़बरों का पुनर्निर्माण किया.

यह भी माना जाता है कि अबू हनीफ़ा ताबईन जो सहाबा के बाद के दौर के थे, में से थे। सहाबा, मुहम्मद साहब के अनुयाईयों को कहा जाता है। कुछ और का कहना है कि अबू हनीफ़ा ने करीब छः सहाबियों को देखा है.

Comments

comments