नज़रियाः मुसलमान बादशाह आने वाले वक्त को पहचान ना सके और खत्म हो गये

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भारत पर अग्रेज़ो का कब्ज़ा केवल और केवल उनकी “फूट डालो और राज करो” की नीति के सफल होने के कारण था। अंग्रेज़ सांप्रदायिक नहीं थे, ना उनके मन में हिन्दू या मुसलमानों को लेकर अलग अलग सोच थी.

उनकी सोच केवल देश की 565 रियासतों बादशाहों और राजा रजवाड़ों को आपस में लड़ाकर एक पक्ष का अपनी शर्तों पर साथ देना और राज्य की सत्ता पर उस राजा को अपना नौकर बना कर राज्य की सत्ता पर कब्ज़ा करना था।

इस खेल में तमाम राजा शामिल हुए और अंत तक अंग्रेजों के खास रहे, मैसूर के राजा वाडियार, ग्वालियर का सिंधिया, जयपुर का राजा जयसिंह घराना, जोधपुर का राजा उम्मेद सिंह घराना, इत्यादि इत्यादि राजा अंग्रेजों के नौकर थे। कहने का अर्थ यह है कि आज जितने भी राजा रजवाड़े और राजाओं के महल आप देखेंगे तो समझ जाईएगा कि यह अंत तक अंग्रेजों के चमचे थे।

अंग्रेज़ी शासन में भी ऐश के साथ रहे और स्वतंत्र भारत में भी ऐश के साथ रह रहे हैं, कहीं मंत्री और कहीं मुख्यमंत्री बन कर राज कर रहे हैं, आज भी राजा साहब कहलाते हैं। जबकि मुसलमान बादशाह ऐसा ना कर सके।

अंग्रेज़ों के आगमन के बाद भारत में 9 मुगल बादशाह हुए और मैसूर के टीपू सुल्तान, जंजिरा के नवाब सिदि मुहम्मद ख़ान, रामपुर के नवाब, नवाब सईयद मुहम्मद क़ाज़ीम ‘अली ख़ान बहादुर , बनगानपल्ली के नवाब, नवाब सईयद फ़ज़ल-ए-अली ख़ान, लोहारु के नवाब मिर्ज़ी अलाउद्दीन अहमद ख़ान, मलेरकोटला के नवाब मुहम्मद इफ़तिक़ार अली ख़ा बहादुर, टोंक रियासत के नवाब फ़ारुख़ अली ख़ान, हैदराबाद रियासत के नवाब उस्मान, सवानुर के नवाब, अब्दुल माजिद ख़ान और बँटवारे में बने पाकिस्तान की रियासतें को शामिल कर लें.

तो करीब 20 रियासतें और 9 मुगल बादशाह अंग्रेज़ी हुकूमत में थे जो और वाडियार, सिंधिया, उम्मेद सिंह जयसिंह राजाओं कि तरह यह मुसलमान बादशाह ऐसा ना कर सके और अपने वतन की मिट्टी को गुलामी से बचाने के लिए अंग्रेज़ी हूकुमत से या तो लड़े, मरे और बर्बाद हुए या उनसे दूर ही रहे, जिसके कारण उनके महल हवेली तो छोड़िए उनका नामलेवा भी कोई नहीं बल्कि आज वह इस देश में गालियाँ खा रहे हैं।

कभी कभी सोचता हूं कि वह क्या बेवकूफी कर गये वर्ना आज उनके वंशज भी तमाम महलों में ऐश कर रहे होते तो कहीं बादशाह कहलाते और 9 क्विंटल के सोने के हौदे पर चढ़ कर मुहर्रम के जुलूस में चलते। जो आज या तो भीख माँग कर गुजारा कर रहे हैं या रिक्शा चलाकर जीवन जी रहे हैं।

दरअसल मुसलमान बादशाह आने वाले वक्त को पहचान ना सके और खत्म हो गये, आज और आने वाले वक्त में वह इस देश के खलनायक और आक्रमणकारी होंगे और अंग्रेजी ज़ुल्म का इतिहास इस देश से धीरे धीरे विलुप्त हो जाएगा क्युंकि अंग्रेज़ों के सहवास से उत्पन्न उनकी औलादें आज सत्तासीन हैं जो भारत में अंग्रेजी नीति “फूट करो और राज करो” की नीति पर सफलता से चल रहे हैं।

आज का मुसलमान अपने इस इतिहास से कुछ नहीं सीखा और बिखरता जा रहा है, अग्रेजों की औलादों की “फूट डालो और राज करो” की नीति में फँसता जा रहा है। और बाबरी मस्जिद को लेकर मौलाना सलमान नदवी को फोड़ कर मुसलमानों में थोड़ा ही सही पर बिखराव लाना अंग्रेज पुत्र संघियों की नयी उपल्ब्धि है। मुसलमानों में ऐसे ही और लोग तोड़े फोड़े जाएंगे।

फिरके फिरके में बंटे और कुरान और हदीस से अधिक अपने फिरके के मौलानाओं पर यकी रखने वाले सुन्नी मुसलमानों को अपनी ही कौम के शिया हज़रात से कम से कम कुछ सबक तो लेना ही चाहिए कि एक “वसीम रिज़वी” के बाबरी मस्जिद के खिलाफ बयान पर पूरे देश के शिया मौलानाओं और पूरे शिया समाज ने ना केवल निंदा की बल्के वसीम रिजवी पर कार्यवाही करने तक की माँग की , शिया समाज से वसीम रिज़वी का बहिष्कार कर दिया। वहीं मौलाना सलमान नदवी के बयान के बाद सुन्नी मुसलमान कुछ हद तक बिखर गया।

यह अंग्रेजी औलादों की “फूट डालो और राज करों” की नीति की सफलता है, उनको इसके लिए बधाई। कुछ सीख लीजिए नहीं तो मुस्लिम रियासतों से बुरा हाल होगा इस हिन्दुस्तान में, एक होकर ना रहोगे तो मिट जाओगे ऐ मुसलमानों। तुम्हारी दास्तां भी ना रहेगी दास्तानों में। मुस्लिम बादशाहों की तरह। मोहम्मद जाहिद (लेखक सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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